श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.52

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

शृतेन तेन पुरुषं यजेत सुसमाहितः।

नैवेद्यं चातिगुणवद् दद्यात्पुरुषतुष्टिदम्॥ ५२

śṛtena tena puruṣaṃ yajeta susamāhitaḥ|

naivedyaṃ cātiguṇavad dadyātpuruṣatuṣṭidam|| 52

अर्थ

अत्यन्त एकाग्रचित्तसे उसी पकाये हुए चरुके द्वारा भगवान्‌का यजन करना चाहिये और उनको प्रसन्‍न करनेवाला गुणयुक्त तथा स्वादिष्ट नैवेद्य अर्पण करना चाहिये॥ ५२॥

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