॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.17.23
प्रविष्टमात्मनि हरेरंशं ह्यवितथेक्षणः।
सोऽदित्यां वीर्यमाधत्त तपसा चिरसंभृतम्।
समाहितमना राजन्दारुण्यग्निं यथानिलः॥ २३
praviṣṭamātmani hareraṃśaṃ hyavitathekṣaṇaḥ|
so'dityāṃ vīryamādhatta tapasā cirasaṃbhṛtam|
samāhitamanā rājandāruṇyagniṃ yathānilaḥ|| 23
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इतना कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। उस समय अदिति यह जानकर कि स्वयं भगवान् मेरे गर्भसे जन्म लेंगे, अपनी कृतकृत्यताका अनुभव करने लगी। भला, यह कितनी दुर्लभ बात है! वह बड़े प्रेमसे अपने पतिदेव कश्यपकी सेवा करने लगी। कश्यपजी सत्यदर्शी थे, उनके नेत्रोंसे कोई बात छिपी नहीं रहती थी। अपने समाधि-योगसे उन्होंने जान लिया कि भगवान्का अंश मेरे अंदर प्रविष्ट हो गया है। जैसे वायु काठमें अग्निका आधान करती है, वैसे ही कश्यपजीने समाहित चित्तसे अपनी तपस्याके द्वारा चिर-संचित वीर्यका अदितिमें आधान किया॥ २१—२३॥