॥ श्रीहरिः ॥
जयोरुगाय भगवन्नुरुक्रम नमोऽस्तु ते।
नमो ब्रह्मण्यदेवाय त्रिगुणाय नमो नमः॥ २५
jayorugāya bhagavannurukrama namo'stu te|
namo brahmaṇyadevāya triguṇāya namo namaḥ|| 25
अर्थ
ब्रह्माजीने कहा—समग्र कीर्तिके आश्रय भगवन्! आपकी जय हो। अनन्त शक्तियोंके अधिष्ठान! आपके चरणोंमें नमस्कार है। ब्रह्मण्यदेव! त्रिगुणोंके नियामक! आपके चरणोंमें मेरे बार-बार प्रणाम हैं॥ २५॥
जयोरुगाय भगवन्नुरुक्रम नमोऽस्तु ते।
नमो ब्रह्मण्यदेवाय त्रिगुणाय नमो नमः॥ २५
ब्रह्माजीने कहा—समग्र कीर्तिके आश्रय भगवन्! आपकी जय हो। अनन्त शक्तियोंके अधिष्ठान! आपके चरणोंमें नमस्कार है। ब्रह्मण्यदेव! त्रिगुणोंके नियामक! आपके चरणोंमें मेरे बार-बार प्रणाम हैं॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.17.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 987) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/17/25/