श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.17.7

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

प्रीत्या शनैर्गद्गदया गिरा हरिं

तुष्टाव सा देव्यदितिः कुरूद्वह।

उद्वीक्षती सा पिबतीव चक्षुषा

रमापतिं यज्ञपतिं जगत्पतिम्॥ ७

prītyā śanairgadgadayā girā hariṃ

tuṣṭāva sā devyaditiḥ kurūdvaha|

udvīkṣatī sā pibatīva cakṣuṣā

ramāpatiṃ yajñapatiṃ jagatpatim|| 7

अर्थ

परीक्षित्! देवी अदिति अपने प्रेमपूर्ण नेत्रोंसे लक्ष्मीपति, विश्‍वपति, यज्ञेश्‍वर-भगवान्‌को इस प्रकार देख रही थी, मानो वह उन्हें पी जायगी। फिर बड़े प्रेमसे, गद्गद वाणीसे, धीरे-धीरे उसने भगवान्‌की स्तुति की॥ ७॥✎ 769 770 771 772

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #769 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #770 शब्दोंके बीचका स्थान: यज्ञेश्‍वर-भगवान् को → यज्ञेश्‍वर-भगवान्‌को
  • #771 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #772 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें