॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.18.12
यत् तद् वपुर्भाति विभूषणायुधै—
रव्यक्तचिद् व्यक्तमधारयद्धरिः।
बभूव तेनैव स वामनो वटुः
सम्पश्यतोर्दिव्यगतिर्यथा नटः॥ १२
yat tad vapurbhāti vibhūṣaṇāyudhai—
ravyaktacid vyaktamadhārayaddhariḥ|
babhūva tenaiva sa vāmano vaṭuḥ
sampaśyatordivyagatiryathā naṭaḥ|| 12
अर्थ
परीक्षित्! भगवान् स्वयं अव्यक्त एवं चित्स्वरूप हैं। उन्होंने जो परम कान्तिमय आभूषण एवं आयुधोंसे युक्त वह शरीर ग्रहण किया था, उसी शरीरसे, कश्यप और अदितिके देखते-देखते वामन ब्रह्मचारीका रूप धारण कर लिया—ठीक वैसे ही, जैसे नट अपना वेष बदल ले। क्यों न हो, भगवान्की लीला तो अद्भुत है ही॥ १२॥✎ 781