श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.18.22

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

त ऋत्विजो यजमानः सदस्या

हतत्विषो वामनतेजसा नृप।

सूर्यः किलायात्युत वा विभावसुः

सनत्कुमारोऽथ दिदृक्षया क्रतोः॥ २२

ta ṛtvijo yajamānaḥ sadasyā

hatatviṣo vāmanatejasā nṛpa|

sūryaḥ kilāyātyuta vā vibhāvasuḥ

sanatkumāro'tha didṛkṣayā kratoḥ|| 22

अर्थ

परीक्षित्! वामनभगवान्‌के तेजसे ऋत्विज्, यजमान और सदस्य—सब-के-सब निस्तेज हो गये। वे लोग सोचने लगे कि कहीं यज्ञ देखनेके लिये सूर्य, अग्‍नि अथवा सनत्कुमार तो नहीं आ रहे हैं॥ २२॥✎ 786 787 788 789

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #786 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् को → वामनभगवान्‌को
  • #787 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #788 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् ने → वामनभगवान्‌ने
  • #789 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् को → वामनभगवान्‌को

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