भगवान् गलेमें अपनी स्वरूपभूत वनमाला धारण किये हुए थे, जिसके चारों ओर झुंड-के-झुंड भौंरे गुंजार कर रहे थे। उनके कण्ठमें कौस्तुभमणि सुशोभित थी। भगवान्की अंगकान्तिसे प्रजापति कश्यपजीके घरका अन्धकार नष्ट हो गया॥ ३॥✎ 778
मधुव्रतव्रातविघुष्टया स्वया
विराजितः श्रीवनमालया हरिः।
प्रजापतेर्वेश्मतमः स्वरोचिषा
विनाशयन् कण्ठनिविष्टकौस्तुभः॥ ३
भगवान् गलेमें अपनी स्वरूपभूत वनमाला धारण किये हुए थे, जिसके चारों ओर झुंड-के-झुंड भौंरे गुंजार कर रहे थे। उनके कण्ठमें कौस्तुभमणि सुशोभित थी। भगवान्की अंगकान्तिसे प्रजापति कश्यपजीके घरका अन्धकार नष्ट हो गया॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.18.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 989) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/18/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)