जो कुछ प्रारब्धसे मिल जाय, उसीसे सन्तुष्ट हो रहनेवाला पुरुष अपना जीवन सुखसे व्यतीत करता है। परन्तु अपनी इन्द्रियोंको वशमें न रखनेवाला तीनों लोकोंका राज्य पानेपर भी दुःखी ही रहता है। क्योंकि उसके हृदयमें असन्तोषकी आग धधकती रहती है॥ २४॥
यदृच्छयोपपन्नेन संतुष्टो वर्तते सुखम्।
नासंतुष्टस्त्रिभिर्लोकैरजितात्मोपसादितैः॥ २४
जो कुछ प्रारब्धसे मिल जाय, उसीसे सन्तुष्ट हो रहनेवाला पुरुष अपना जीवन सुखसे व्यतीत करता है। परन्तु अपनी इन्द्रियोंको वशमें न रखनेवाला तीनों लोकोंका राज्य पानेपर भी दुःखी ही रहता है। क्योंकि उसके हृदयमें असन्तोषकी आग धधकती रहती है॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.19.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 995) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/19/24/