इसमें सन्देह नहीं कि आप मुँहमाँगी वस्तु देनेवालोंमें शिरोमणि हैं। इसलिये मैं आपसे केवल तीन पग भूमि ही माँगता हूँ। इतनेसे ही मेरा काम बन जायगा। धन उतना ही संग्रह करना चाहिये, जितनेकी आवश्यकता हो॥ २७॥
तस्मात् त्रीणि पदान्येव वृणे त्वद् वरदर्षभात्।
एतावतैव सिद्धोऽहं वित्तं यावत्प्रयोजनम्॥ २७
इसमें सन्देह नहीं कि आप मुँहमाँगी वस्तु देनेवालोंमें शिरोमणि हैं। इसलिये मैं आपसे केवल तीन पग भूमि ही माँगता हूँ। इतनेसे ही मेरा काम बन जायगा। धन उतना ही संग्रह करना चाहिये, जितनेकी आवश्यकता हो॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.19.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 995) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/19/27/