श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.19.5

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

यतो जातो हिरण्याक्षश्‍चरन्‍नेक इमां महीम्।

प्रतिवीरं दिग्विजये नाविन्दत गदायुधः॥ ५

yato jāto hiraṇyākṣaścaranneka imāṃ mahīm|

prativīraṃ digvijaye nāvindata gadāyudhaḥ|| 5

अर्थ

आपके कुलमें ही हिरण्याक्ष-जैसे वीरका जन्म हुआ था। वह वीर जब हाथमें गदा लेकर अकेला ही दिग्विजयके लिये निकला, तब सारी पृथ्वीमें घूमनेपर भी उसे अपनी जोड़का कोई वीर न मिला॥ ५॥

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