श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.2.15

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

कुमुदोत्पलकह्लारशतपत्रश्रियोर्जितम् ।

मत्तषट्पदनिर्घुष्टं शकुन्तैश्‍च कलस्वनैः॥ १५

kumudotpalakahlāraśatapatraśriyorjitam |

mattaṣaṭpadanirghuṣṭaṃ śakuntaiśca kalasvanaiḥ|| 15

अर्थ

और भी विविध जातिके कुमुद, उत्पल, कह्लार, शतदल आदि कमलोंकी अनूठी छटा छिटक रही थी। मतवाले भौंरे गूँज रहे थे। मनोहर पक्षी कलरव कर रहे थे। हंस, कारण्डव, चक्रवाक और सारस दल-के-दल भरे हुए थे। पनडुब्बी, बतख और पपीहे कूज रहे थे। मछली और कछुओंके चलनेसे कमलके फूल हिल जाते थे, जिससे उनका पराग झड़कर जलको सुन्दर और सुगन्धित बना देता था। कदम्ब, बेंत, नरकुल, कदम्बलता, बेन आदि वृक्षोंसे वह घिरा था॥ १५—१७॥

यह अर्थ श्लोक 15–17 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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