॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.2.17
matsyakacchapasañcāracalatpadmarajaḥpayaḥ|
kadambavetasanalanīpavañjulakairvṛtam || 17
अर्थ
और भी विविध जातिके कुमुद, उत्पल, कह्लार, शतदल आदि कमलोंकी अनूठी छटा छिटक रही थी। मतवाले भौंरे गूँज रहे थे। मनोहर पक्षी कलरव कर रहे थे। हंस, कारण्डव, चक्रवाक और सारस दल-के-दल भरे हुए थे। पनडुब्बी, बतख और पपीहे कूज रहे थे। मछली और कछुओंके चलनेसे कमलके फूल हिल जाते थे, जिससे उनका पराग झड़कर जलको सुन्दर और सुगन्धित बना देता था। कदम्ब, बेंत, नरकुल, कदम्बलता, बेन आदि वृक्षोंसे वह घिरा था॥ १५—१७॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—त्पङ्करजः।
- २
प्रा० पा०—लसद्विविधैः पुलिनैर्वृतम्।