श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.20.11

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

यजन्ति यज्ञक्रतुभिर्यमादृता

भवन्त आम्नायविधानकोविदाः।

स एव विष्णुर्वरदोऽस्तु वा परो

दास्याम्यमुष्मै क्षितिमीप्सितां मुने॥ ११

yajanti yajñakratubhiryamādṛtā

bhavanta āmnāyavidhānakovidāḥ|

sa eva viṣṇurvarado'stu vā paro

dāsyāmyamuṣmai kṣitimīpsitāṃ mune|| 11

अर्थ

महर्षे! वेदविधिके जाननेवाले आपलोग बड़े आदरसे यज्ञ-यागादिके द्वारा जिनकी आराधना करते हैं—वे वरदानी विष्णु ही इस रूपमें हों अथवा कोई दूसरा हो, मैं इनकी इच्छाके अनुसार इन्हें पृथ्वीका दान करूँगा॥ ११॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें