यदि ये पवित्रकीर्ति भगवान् विष्णु ही हैं तो अपना यश नहीं खोना चाहेंगे (अपनी माँगी हुई वस्तु लेकर ही रहेंगे)’। मुझे युद्धमें मारकर भी पृथ्वी छीन सकते हैं और यदि कदाचित् ये कोई दूसरे ही हैं, तो मेरे बाणोंकी चोटसे सदाके लिये रणभूमिमें सो जायँगे॥ १३॥
एष वा उत्तमश्लोको न जिहासति यद् यशः।
हत्वा मैनां हरेद् युद्धे शयीत निहतो मया॥ १३
यदि ये पवित्रकीर्ति भगवान् विष्णु ही हैं तो अपना यश नहीं खोना चाहेंगे (अपनी माँगी हुई वस्तु लेकर ही रहेंगे)’। मुझे युद्धमें मारकर भी पृथ्वी छीन सकते हैं और यदि कदाचित् ये कोई दूसरे ही हैं, तो मेरे बाणोंकी चोटसे सदाके लिये रणभूमिमें सो जायँगे॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.20.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 999) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/20/13/