॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.20.27
वाण्यां च छन्दांसि रसे जलेशं
भ्रुवोर्निषेधं च विधिं च पक्ष्मसु।
अहश्च रात्रिं च परस्य पुंसो
मन्युं ललाटेऽधर एव लोभम्॥ २७
vāṇyāṃ ca chandāṃsi rase jaleśaṃ
bhruvorniṣedhaṃ ca vidhiṃ ca pakṣmasu|
ahaśca rātriṃ ca parasya puṃso
manyuṃ lalāṭe'dhara eva lobham|| 27
अर्थ
वाणीमें वेद, रसनामें वरुण, भौंहोंमें विधि और निषेध, पलकोंमें दिन और रात। विश्वरूपके ललाटमें क्रोध और नीचेके ओठमें लोभके दर्शन हुए॥ २७॥