श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.20.32

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

सुनन्दमुख्या उपतस्थुरीशं

पार्षदमुख्याः सहलोकपालाः।

स्फुरत्किरीटाङ्गदमीनकुण्डल-

श्रीवत्सरत्नोत्तममेखलाम्बरैः ॥ ३२

sunandamukhyā upatasthurīśaṃ

pārṣadamukhyāḥ sahalokapālāḥ|

sphuratkirīṭāṅgadamīnakuṇḍala-

śrīvatsaratnottamamekhalāmbaraiḥ || 32

अर्थ

परीक्षित्! सर्वात्मा भगवान्‌में यह सम्पूर्ण जगत् देखकर सब-के-सब दैत्य अत्यन्त भयभीत हो गये। इसी समय भगवान्‌के पास असह्य तेजवाला सुदर्शन चक्र, गरजते हुए मेघके समान भयंकर टंकार करनेवाला शार्ङ्गधनुष, बादलकी तरह गम्भीर शब्द करनेवाला पांचजन्य शंख, विष्णुभगवान्‌की अत्यन्त वेगवती कौमोदकी गदा, सौ चन्द्राकार चिह्नोंवाली ढाल और विद्याधर नामकी तलवार, अक्षय बाणोंसे भरे दो तरकश तथा लोकपालोंके सहित भगवान्‌के सुनन्द आदि पार्षदगण सेवा करनेके लिये उपस्थित हो गये। उस समय भगवान्‌की बड़ी शोभा हुई। मस्तकपर मुकुट, बाहुओंमें बाजूबंद, कानोंमें मकराकृति कुण्डल, वक्षःस्थलपर श्रीवत्सचिह्न, गलेमें कौस्तुभमणि, कमरमें मेखला और कंधेपर पीताम्बर शोभायमान हो रहा था॥ ३०-३२॥✎ 799 800 801

यह अर्थ श्लोक 30–32 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #799 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #800 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् की → विष्णुभगवान्‌की
  • #801 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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