श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.21.2

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

वेदोपवेदा नियमान्विता यमा-

स्तर्केतिहासाङ्गपुराणसंहिताः ।

ये चापरे योगसमीरदीपित-

ज्ञानाग्‍निना रन्धितकर्मकल्मषाः।

ववन्दिरे यत्स्मरणानुभावतः

स्वायम्भुवं धाम गता अकर्मकम्॥ २

vedopavedā niyamānvitā yamā-

starketihāsāṅgapurāṇasaṃhitāḥ |

ye cāpare yogasamīradīpita-

jñānāgninā randhitakarmakalmaṣāḥ|

vavandire yatsmaraṇānubhāvataḥ

svāyambhuvaṃ dhāma gatā akarmakam|| 2

अर्थ

वेद, उपवेद, नियम, यम, तर्क, इतिहास, वेदांग और पुराण-संहिताएँ—जो ब्रह्मलोकमें मूर्तिमान् होकर निवास करते हैं—तथा जिन लोगोंने योगरूप वायुसे ज्ञानाग्‍निको प्रज्वलित करके कर्ममलको भस्म कर डाला है, वे महात्मा, सबने भगवान्‌के चरणकी वन्दना की। इसी चरणकमलके स्मरणकी महिमासे ये सब कर्मके द्वारा प्राप्त न होनेयोग्य ब्रह्माजीके धाममें पहुँचे हैं॥ २॥

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