परीक्षित्! ब्रह्माके कमण्डलुका वही जल विश्वरूप भगवान्के पाँव पखारनेसे पवित्र होनेके कारण उन गंगाजीके रूपमें परिणत हो गया, जो आकाशमार्गसे पृथ्वीपर गिरकर तीनों लोकोंको पवित्र करती हैं। ये गंगाजी क्या हैं, भगवान्की मूर्तिमान् उज्ज्वल कीर्ति॥ ४॥✎ 803
धातुः कमण्डलुजलं तदुरुक्रमस्य
पादावनेजनपवित्रतया नरेन्द्र।
स्वर्धुन्यभून्नभसि सा पतती निमार्ष्टि
लोकत्रयं भगवतो विशदेव कीर्तिः॥ ४
परीक्षित्! ब्रह्माके कमण्डलुका वही जल विश्वरूप भगवान्के पाँव पखारनेसे पवित्र होनेके कारण उन गंगाजीके रूपमें परिणत हो गया, जो आकाशमार्गसे पृथ्वीपर गिरकर तीनों लोकोंको पवित्र करती हैं। ये गंगाजी क्या हैं, भगवान्की मूर्तिमान् उज्ज्वल कीर्ति॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.21.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1003) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/21/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)