श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार भगवान्ने असुरराज बलिका बड़ा तिरस्कार किया और उन्हें धैर्यसे विचलित करना चाहा। परन्तु वे तनिक भी विचलित न हुए, बड़े धैर्यसे बोले॥ १॥✎ 813
एवं विप्रकृतो राजन् बलिर्भगवतासुरः।
भिद्यमानोऽप्यभिन्नात्मा प्रत्याहाविक्लवं वचः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार भगवान्ने असुरराज बलिका बड़ा तिरस्कार किया और उन्हें धैर्यसे विचलित करना चाहा। परन्तु वे तनिक भी विचलित न हुए, बड़े धैर्यसे बोले॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.22.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1006) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/22/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)