॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.22.16
प्रह्राद उवाच
त्वयैव दत्तं पदमैन्द्रमूर्जितं
हृतं तदेवाद्य तथैव शोभनम्।
मन्ये महानस्य कृतो ह्यनुग्रहो
विभ्रंशितो यच्छ्रिय आत्ममोहनात्॥ १६
tvayaiva dattaṃ padamaindramūrjitaṃ
hṛtaṃ tadevādya tathaiva śobhanam|
manye mahānasya kṛto hyanugraho
vibhraṃśito yacchriya ātmamohanāt|| 16
अर्थ
प्रह्लादजीने कहा—प्रभो! आपने ही बलिको यह ऐश्वर्यपूर्ण इन्द्रपद दिया था, अब आज आपने ही उसे छीन लिया। आपका देना जैसा सुन्दर है, वैसा ही सुन्दर लेना भी! मैं समझता हूँ कि आपने इसपर बड़ी भारी कृपा की है, जो आत्माको मोहित करनेवाली राज्यलक्ष्मीसे इसे अलग कर दिया॥ १६॥