श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.22.28

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

एष दानवदैत्यानामग्रणीः कीर्तिवर्धनः।

अजैषीदजयां मायां सीदन्‍नपि न मुह्यति॥ २८

eṣa dānavadaityānāmagraṇīḥ kīrtivardhanaḥ|

ajaiṣīdajayāṃ māyāṃ sīdannapi na muhyati|| 28

अर्थ

यह बलि दानव और दैत्य दोनों ही वंशोंमें अग्रगण्य और उनकी कीर्ति बढ़ानेवाला है। इसने उस मायापर विजय प्राप्त कर ली है, जिसे जीतना अत्यन्त कठिन है। तुम देख ही रहे हो, इतना दुःख भोगनेपर भी यह मोहित नहीं हुआ॥ २८॥✎ 816

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #816 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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