श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.22.7

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

तेनाहं निगृहीतोऽस्मि भवता भूरिकर्मणा।

बद्धश्‍च वारुणैः पाशैर्नातिव्रीडे न च व्यथे॥ ७

tenāhaṃ nigṛhīto'smi bhavatā bhūrikarmaṇā|

baddhaśca vāruṇaiḥ pāśairnātivrīḍe na ca vyathe|| 7

अर्थ

जिनकी ऐसी महिमा, ऐसी अनन्त लीलाएँ हैं, वही आप मुझे दण्ड दे रहे हैं और वरुणपाशसे बाँध रहे हैं। इसकी न तो मुझे कोई लज्जा है और न किसी प्रकारकी व्यथा ही॥ ७॥

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