॥ श्रीहरिः ॥
नित्यं द्रष्टासि मां तत्र गदापाणिमवस्थितम्।
मद्दर्शनमहाह्लादध्वस्तकर्मनिबन्धनः ॥ १०
nityaṃ draṣṭāsi māṃ tatra gadāpāṇimavasthitam|
maddarśanamahāhlādadhvastakarmanibandhanaḥ || 10
अर्थ
वहाँ तुम मुझे नित्य ही गदा हाथमें लिये खड़ा देखोगे। मेरे दर्शनके परमानन्दमें मग्न रहनेके कारण तुम्हारे सारे कर्मबन्धन नष्ट हो जायँगे॥ १०॥
नित्यं द्रष्टासि मां तत्र गदापाणिमवस्थितम्।
मद्दर्शनमहाह्लादध्वस्तकर्मनिबन्धनः ॥ १०
वहाँ तुम मुझे नित्य ही गदा हाथमें लिये खड़ा देखोगे। मेरे दर्शनके परमानन्दमें मग्न रहनेके कारण तुम्हारे सारे कर्मबन्धन नष्ट हो जायँगे॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.23.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1012) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/23/10/