श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.24.1

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

भगवान्‌के मत्स्यावतारकी कथा

राजोवाच

भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि हरेरद्भुतकर्मणः।

अवतारकथामाद्यां मायामत्स्यविडम्बनम्॥ १

bhagavañchrotumicchāmi hareradbhutakarmaṇaḥ|

avatārakathāmādyāṃ māyāmatsyaviḍambanam|| 1

अर्थ

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवान्‌के कर्म बड़े अद्भुत हैं। उन्होंने एक बार अपनी योगमायासे मत्स्यावतार धारण करके बड़ी सुन्दर लीला की थी, मैं उनके उसी आदि-अवतारकी कथा सुनना चाहता हूँ॥ १॥✎ 830

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #830 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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