उस मछलीने बड़ी करुणाके साथ परम दयालु राजा सत्यव्रतसे कहा—‘राजन्! आप बड़े दीनदयालु हैं। आप जानते ही हैं कि जलमें रहनेवाले जन्तु अपनी जातिवालोंको भी खा डालते हैं। मैं उनके भयसे अत्यन्त व्याकुल हो रही हूँ। आप मुझे फिर इसी नदीके जलमें क्यों छोड़ रहे हैं?॥ १४॥✎ 832
तमाह सातिकरुणं महाकारुणिकं नृपम्।
यादोभ्यो ज्ञातिघातिभ्यो दीनां मां दीनवत्सल।
कथं विसृजसे राजन् भीतामस्मिन् सरिज्जले॥ १४
उस मछलीने बड़ी करुणाके साथ परम दयालु राजा सत्यव्रतसे कहा—‘राजन्! आप बड़े दीनदयालु हैं। आप जानते ही हैं कि जलमें रहनेवाले जन्तु अपनी जातिवालोंको भी खा डालते हैं। मैं उनके भयसे अत्यन्त व्याकुल हो रही हूँ। आप मुझे फिर इसी नदीके जलमें क्यों छोड़ रहे हैं?॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.24.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1015) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/24/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)