श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.24.17

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

सा तु तत्रैकरात्रेण वर्धमाना कमण्डलौ।

अलब्ध्वाऽऽत्मावकाशं वा इदमाह महीपतिम्॥ १७

sā tu tatraikarātreṇa vardhamānā kamaṇḍalau|

alabdhvā''tmāvakāśaṃ vā idamāha mahīpatim|| 17

अर्थ

आश्रमपर लानेके बाद एक रातमें ही वह मछली उस कमण्डलुमें इतनी बढ़ गयी कि उसमें उसके लिये स्थान ही न रहा। उस समय मछलीने राजासे कहा॥ १७॥✎ 833 2038

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #833 शब्दोंके बीचका स्थान: मत्स्यभगवान् ने → मत्स्यभगवान्‌ने
  • #2038 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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