श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.24.23

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

इत्युक्तः सोऽनयन्मत्स्यं तत्र तत्राविदासिनि।

जलाशये सम्मितं तं समुद्रे प्राक्षिपज्झषम्॥ २३

ityuktaḥ so'nayanmatsyaṃ tatra tatrāvidāsini|

jalāśaye sammitaṃ taṃ samudre prākṣipajjhaṣam|| 23

अर्थ

मत्स्यभगवान्‌के इस प्रकार कहनेपर वे एक-एक करके उन्हें कई अटूट जलवाले सरोवरोंमें ले गये; परन्तु जितना बड़ा सरोवर होता, उतने ही बड़े वे बन जाते। अन्तमें उन्होंने उन लीलामत्स्यको समुद्रमें छोड़ दिया॥ २३॥✎ 833 2038

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #833 शब्दोंके बीचका स्थान: मत्स्यभगवान् ने → मत्स्यभगवान्‌ने
  • #2038 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें