अवश्य ही आप साक्षात् सर्वशक्तिमान् सर्वान्तर्यामी अविनाशी श्रीहरि हैं। जीवोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही आपने जलचरका रूप धारण किया है॥ २७॥✎ 834
नूनं त्वं भगवान् साक्षाद्धरिर्नारायणोऽव्ययः।
अनुग्रहाय भूतानां धत्से रूपं जलौकसाम्॥ २७
अवश्य ही आप साक्षात् सर्वशक्तिमान् सर्वान्तर्यामी अविनाशी श्रीहरि हैं। जीवोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही आपने जलचरका रूप धारण किया है॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.24.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1017) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/24/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#834 शब्दोंके बीचका स्थान: मत्स्यभगवान् की → मत्स्यभगवान्की