श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब राजा सत्यव्रतने इस प्रकार प्रार्थना की; तब मत्स्यरूपधारी पुरुषोत्तमभगवान्ने प्रलयके समुद्रमें विहार करते हुए उन्हें आत्मतत्त्वका उपदेश किया॥ ५४॥✎ 842
इत्युक्तवन्तं नृपतिं भगवानादिपूरुषः।
मत्स्यरूपी महाम्भोधौ विहरंस्तत्त्वमब्रवीत्॥ ५४
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब राजा सत्यव्रतने इस प्रकार प्रार्थना की; तब मत्स्यरूपधारी पुरुषोत्तमभगवान्ने प्रलयके समुद्रमें विहार करते हुए उन्हें आत्मतत्त्वका उपदेश किया॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.24.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1020) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/24/54/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#842 शब्दोंके बीचका स्थान: पुरुषोत्तमभगवान् ने → पुरुषोत्तमभगवान्ने