श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.1

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अथ तृतीयोऽध्यायः

गजेन्द्रके द्वारा भगवान्‌की स्तुति और उसका संकटसे मुक्त होना ✎ 659

श्रीशुक उवाच

एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि।

जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम्॥ १

evaṃ vyavasito buddhyā samādhāya mano hṛdi|

jajāpa paramaṃ jāpyaṃ prāgjanmanyanuśikṣitam|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अपनी बुद्धिसे ऐसा निश्‍चय करके गजेन्द्रने अपने मनको हृदयमें एकाग्र किया और फिर पूर्वजन्ममें सीखे हुए श्रेष्ठ स्तोत्रके जपद्वारा भगवान्‌की स्तुति करने लगा॥ १॥✎ 660

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #660 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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