श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.26

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

सोऽहं विश्‍वसृजं विश्‍वमविश्‍वं विश्‍ववेदसम्।

विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम्॥ २६

so'haṃ viśvasṛjaṃ viśvamaviśvaṃ viśvavedasam|

viśvātmānamajaṃ brahma praṇato'smi paraṃ padam|| 26

अर्थ

इसलिये मैं उन परब्रह्म परमात्माकी शरणमें हूँ जो विश्‍वरहित होनेपर भी विश्‍वके रचयिता और विश्‍वस्वरूप हैं—साथ ही जो विश्‍वकी अन्तरात्माके रूपमें विश्‍वरूप सामग्रीसे क्रीड़ा भी करते रहते हैं, उन अजन्मा परमपदस्वरूप ब्रह्मको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २६॥✎ 664

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #664 शब्दोंके बीचका स्थान: हैं,उन → हैं, उन

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