आपकी माया अहंबुद्धिसे आत्माका स्वरूप ढक गया है, इसीसे यह जीव अपने स्वरूपको नहीं जान पाता। आपकी महिमा अपार है। उन सर्वशक्तिमान् एवं माधुर्यनिधि भगवान्की मैं शरणमें हूँ॥ २९॥✎ 665
नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहंधिया हतम्।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम्॥ २९
आपकी माया अहंबुद्धिसे आत्माका स्वरूप ढक गया है, इसीसे यह जीव अपने स्वरूपको नहीं जान पाता। आपकी महिमा अपार है। उन सर्वशक्तिमान् एवं माधुर्यनिधि भगवान्की मैं शरणमें हूँ॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.3.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 918) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/3/29/