श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.31

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्‍निवासः

स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भिः।

छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान-

श्‍चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः॥ ३१

taṃ tadvadārttamupalabhya jagannivāsaḥ

stotraṃ niśamya divijaiḥ saha saṃstuvadbhiḥ|

chandomayena garuḍena samuhyamāna-

ścakrāyudho'bhyagamadāśu yato gajendraḥ|| 31

अर्थ

विश्‍वके एकमात्र आधार भगवान्‌ने देखा कि गजेन्द्र अत्यन्त पीड़ित हो रहा है। अतः उसकी स्तुति सुनकर वेदमय गरुड़पर सवार हो चक्रधारी भगवान् बड़ी शीघ्रतासे वहाँके लिये चल पड़े, जहाँ गजेन्द्र अत्यन्त संकटमें पड़ा हुआ था। उनके साथ स्तुति करते हुए देवता भी आये॥ ३१॥✎ 667 2029

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #667 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #2029 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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