श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शाप एवं वरदान देनेमें समर्थ अगस्त्य ऋषि इस प्रकार शाप देकर अपनी शिष्यमण्डलीके साथ वहाँसे चले गये। राजर्षि इन्द्रद्युम्नने यह समझकर सन्तोष किया कि यह मेरा प्रारब्ध ही था॥ ११॥✎ 672673
एवं शप्त्वा गतोऽगस्त्यो भगवान् नृप सानुगः।
इन्द्रद्युम्नोऽपि राजर्षिर्दिष्टं तदुपधारयन्॥ ११
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शाप एवं वरदान देनेमें समर्थ अगस्त्य ऋषि इस प्रकार शाप देकर अपनी शिष्यमण्डलीके साथ वहाँसे चले गये। राजर्षि इन्द्रद्युम्नने यह समझकर सन्तोष किया कि यह मेरा प्रारब्ध ही था॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.4.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 920) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/4/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)