श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.4.8

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

स एकदाऽऽराधनकाल आत्मवान्

गृहीतमौनव्रत ईश्‍वरं हरिम्।

जटाधरस्तापस आप्लुतोऽच्युतं

समर्चयामास कुलाचलाश्रमः॥ ८

sa ekadā''rādhanakāla ātmavān

gṛhītamaunavrata īśvaraṃ harim|

jaṭādharastāpasa āpluto'cyutaṃ

samarcayāmāsa kulācalāśramaḥ|| 8

अर्थ

एक बार राजा इन्द्रद्युम्न राजपाट छोड़कर मलयपर्वतपर रहने लगे थे। उन्होंने जटाएँ बढ़ा लीं, तपस्वीका वेष धारण कर लिया। एक दिन स्नानके बाद पूजाके समय मनको एकाग्र करके एवं मौनव्रती होकर वे सर्वशक्तिमान् भगवान्‌की आराधना कर रहे थे॥ ८॥✎ 671

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #671 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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