श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.22

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

न यस्य वध्यो न च रक्षणीयो

नोपेक्षणीयादरणीयपक्षः ।

अथापि सर्गस्थितिसंयमार्थं

धत्ते रजःसत्त्वतमांसि काले॥ २२

na yasya vadhyo na ca rakṣaṇīyo

nopekṣaṇīyādaraṇīyapakṣaḥ |

athāpi sargasthitisaṃyamārthaṃ

dhatte rajaḥsattvatamāṃsi kāle|| 22

अर्थ

यद्यपि उनकी दृष्टिमें न कोई वधका पात्र है और न रक्षाका, उनके लिये न तो कोई उपेक्षणीय है न कोई आदरका पात्र ही—फिर भी सृष्टि, स्थिति और प्रलयके लिये समय-समयपर वे रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणको स्वीकार किया करते हैं॥ २२॥

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