श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.29

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

य१ एकवर्णं तमसः परं त-

दलोकमव्यक्तमनन्तपारम् ।

आसाञ्चकारोपसुपर्णमेन-

मुपासते योगरथेन धीराः॥ २९

ya ekavarṇaṃ tamasaḥ paraṃ ta-

dalokamavyaktamanantapāram |

āsāñcakāropasuparṇamena-

mupāsate yogarathena dhīrāḥ|| 29

अर्थ

जो एकमात्र ज्ञानस्वरूप, प्रकृतिसे परे एवं अदृश्य हैं; जो समस्त वस्तुओंके मूलमें स्थित अव्यक्त हैं और देश, काल अथवा वस्तुसे जिनका पार नहीं पाया जा सकता—वही प्रभु इस जीवके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान रहते हैं। विचारशील मनुष्य भक्तियोगके द्वारा उन्हींकी आराधना करते हैं॥ २९॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—यदेकवर्णं मनसः परं।

    (मुद्रित पृष्ठ 926)

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