श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.36

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यच्चक्षुरासीत् तरणिर्देवयानं

त्रयीमयो ब्रह्मण एष धिष्ण्यम्।

द्वारं च मुक्तेरमृतं च मृत्युः

प्रसीदतां नः स महाविभूतिः॥ ३६

yaccakṣurāsīt taraṇirdevayānaṃ

trayīmayo brahmaṇa eṣa dhiṣṇyam|

dvāraṃ ca mukteramṛtaṃ ca mṛtyuḥ

prasīdatāṃ naḥ sa mahāvibhūtiḥ|| 36

अर्थ

जिनके द्वारा जीव देवयानमार्गसे ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है, जो वेदोंकी साक्षात् मूर्ति और भगवान्‌के ध्यान करनेयोग्य धाम हैं, जो पुण्यलोकस्वरूप होनेके कारण मुक्तिके द्वार एवं अमृतमय हैं और कालरूप होनेके कारण मृत्यु भी हैं—ऐसे सूर्य जिनके नेत्र हैं, वे परम ऐश्‍वर्यशाली भगवान् हमपर प्रसन्‍न हों॥ ३६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें