॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.5.41
विप्रो मुखं१ ब्रह्म च यस्य गुह्यं
राजन्य आसीद् भु२जयोर्बलं च।
ऊ३र्वोर्विडोजोऽङ्घ्रिरवेदशूद्रौ
प्रसीदतां नः स महाविभूतिः॥ ४१
vipro mukhaṃ brahma ca yasya guhyaṃ
rājanya āsīd bhujayorbalaṃ ca|
ūrvorviḍojo'ṅghriravedaśūdrau
prasīdatāṃ naḥ sa mahāvibhūtiḥ|| 41
अर्थ
जिनके मुखसे ब्राह्मण और अत्यन्त रहस्यमय वेद, भुजाओंसे क्षत्रिय और बल, जंघाओंसे वैश्य और उनकी वृत्ति—व्यापारकुशलता तथा चरणोंसे वेदबाह्य शूद्र और उनकी सेवा आदि वृत्ति प्रकट हुई है—वे परम ऐश्वर्यशाली भगवान् हमपर प्रसन्न हों॥ ४१॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—मुखाद्।
- २
प्रा० पा०—करयो०।
- ३
प्रा० पा०—ऊर्वोर्विशोऽङ्घ्रेरभवच्च शूद्रः।