श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.44

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नमोऽस्तु तस्मा उपशान्तशक्तये

स्वाराज्यलाभप्रतिपूरितात्मने ।

गुणेषु मायारचितेषु वृत्तिभि-

र्न सज्जमानाय नभस्वदूतये॥ ४४

namo'stu tasmā upaśāntaśaktaye

svārājyalābhapratipūritātmane |

guṇeṣu māyāraciteṣu vṛttibhi-

rna sajjamānāya nabhasvadūtaye|| 44

अर्थ

जो मायानिर्मित गुणोंमें दर्शनादि वृत्तियोंके द्वारा आसक्त नहीं होते, जो वायुके समान सदा-सर्वदा असंग रहते हैं, जिनमें समस्त शक्तियाँ शान्त हो गयी हैं—उन अपने आत्मानन्दके लाभसे परिपूर्ण आत्मस्वरूप भगवान्‌को हमारे नमस्कार हैं॥ ४४॥✎ 686

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #686 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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