श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.6.1

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

अथ षष्ठोऽध्यायः

देवताओं और दैत्योंका मिलकर समुद्रमन्थनके लिये उद्योग करना

श्रीशुक उवाच

एवं स्तुतः सुरगणैर्भगवान् हरिरीश्‍वरः।

तेषामाविरभूद् राजन्सहस्रार्कोदयद्युतिः॥ १

evaṃ stutaḥ suragaṇairbhagavān harirīśvaraḥ|

teṣāmāvirabhūd rājansahasrārkodayadyutiḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब देवताओंने सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरिकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे उनके बीचमें ही प्रकट हो गये। उनके शरीरकी प्रभा ऐसी थी, मानो हजारों सूर्य एक साथ ही उग गये हों॥ १॥✎ 689 690 2031

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #689 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #690 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #2031 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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