॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.6.25
न भेतव्यं कालकूटाद् विषाज्जलधिसम्भवात्।
लोभः कार्यो न वो जातु रोषः का४मस्तु वस्तुषु॥ २५
na bhetavyaṃ kālakūṭād viṣājjaladhisambhavāt|
lobhaḥ kāryo na vo jātu roṣaḥ kāmastu vastuṣu|| 25
अर्थ
पहले समुद्रसे कालकूट विष निकलेगा, उससे डरना नहीं। और किसी भी वस्तुके लिये कभी भी लोभ न करना। पहले तो किसी वस्तुकी कामना ही नहीं करनी चाहिये, परन्तु यदि कामना हो और वह पूरी न हो तो क्रोध तो करना ही नहीं चाहिये॥ २५॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—कामः स्ववस्तुषु।