इसके बाद उन्होंने अपनी शक्तिसे मन्दराचलको उखाड़ लिया और ललकारते तथा गरजते हुए उसे समुद्रतटकी ओर ले चले। उनकी भुजाएँ परिघके समान थीं, शरीरमें शक्ति थी और अपने-अपने बलका घमंड तो था ही॥ ३३॥✎ 694
ततस्ते मन्दरगिरिमोजसोत्पाट्य दुर्मदाः।
नदन्त उदधिं निन्युः शक्ताः परिघबाहवः॥ ३३
इसके बाद उन्होंने अपनी शक्तिसे मन्दराचलको उखाड़ लिया और ललकारते तथा गरजते हुए उसे समुद्रतटकी ओर ले चले। उनकी भुजाएँ परिघके समान थीं, शरीरमें शक्ति थी और अपने-अपने बलका घमंड तो था ही॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.6.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 933) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/6/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)