श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.7.1

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

अथ सप्तमोऽध्यायः

समुद्रमन्थनका आरम्भ और भगवान् शंकरका विषपान

श्रीशुक उवाच

ते नागराजमामन्त्र्य फलभागेन वासुकिम्।

परिवीय गिरौ तस्मिन् नेत्रमब्धिं मुदान्विताः॥ १

te nāgarājamāmantrya phalabhāgena vāsukim|

parivīya girau tasmin netramabdhiṃ mudānvitāḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! देवता और असुरोंने नागराज वासुकिको यह वचन देकर कि समुद्रमन्थनसे प्राप्त होनेवाले अमृतमें तुम्हारा भी हिस्सा रहेगा, उन्हें भी सम्मिलित कर लिया। इसके बाद उन लोगोंने वासुकि नागको नेतीके समान मन्दराचलमें लपेटकर भलीभाँति उद्यत हो बड़े उत्साह और आनन्दसे अमृतके लिये समुद्रमन्थन प्रारम्भ किया। उस समय पहले-पहल अजितभगवान् वासुकिके मुखकी ओर लग गये, इसलिये देवता भी उधर ही आ जुटे॥ १-२॥✎ 695

यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #695 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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