श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.7.27

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

नाभिर्नभस्ते श्‍वसनं नभस्वान्

सूर्यश्‍च चक्षूंषि जलं स्म रेतः।

परावरात्माश्रयणं तवात्मा

सोमो मनो द्यौर्भगवञ्छिरस्ते॥ २७

nābhirnabhaste śvasanaṃ nabhasvān

sūryaśca cakṣūṃṣi jalaṃ sma retaḥ|

parāvarātmāśrayaṇaṃ tavātmā

somo mano dyaurbhagavañchiraste|| 27

अर्थ

आकाश नाभि है, वायु श्वास है, सूर्य नेत्र हैं और जल वीर्य है। आपका अहंकार नीचे-ऊँचे सभी जीवोंका आश्रय है। चन्द्रमा मन है और प्रभो! स्वर्ग आपका सिर है॥ २७॥

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