श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.7.3

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तन्‍नैच्छन् दैत्यपतयो महापुरुषचेष्टितम्।

न गृह्णीमो वयं पुच्छमहेरङ्गममङ्गलम्॥ ३

tannaicchan daityapatayo mahāpuruṣaceṣṭitam|

na gṛhṇīmo vayaṃ pucchamaheraṅgamamaṅgalam|| 3

अर्थ

परन्तु भगवान्‌की यह चेष्टा दैत्यसेनापतियोंको पसंद न आयी। उन्होंने कहा कि ‘पूँछ तो साँपका अशुभ अंग है, हम उसे नहीं पकड़ेंगे॥ ३॥✎ 695

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #695 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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