॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.7.30
छाया त्वधर्मोर्मिषु यैर्विसर्गो
नेत्रत्रयं सत्त्वरजस्तमांसि।
सांख्यात्मनः२ शास्त्रकृतस्तवेक्षा
छन्दोमयो देव ऋषिः पुराणः॥ ३०
chāyā tvadharmormiṣu yairvisargo
netratrayaṃ sattvarajastamāṃsi|
sāṃkhyātmanaḥ śāstrakṛtastavekṣā
chandomayo deva ṛṣiḥ purāṇaḥ|| 30
अर्थ
अधर्मकी दम्भ-लोभ आदि तरंगोंमें आपकी छाया है जिनसे विविध प्रकारकी सृष्टि होती है, वे सत्त्व, रज और तम—आपके तीन नेत्र हैं। प्रभो! गायत्री आदि छन्दरूप सनातन वेद ही आपका विचार है। क्योंकि आप ही सांख्य आदि समस्त शास्त्रोंके रूपमें स्थित हैं और उनके कर्ता भी हैं॥ ३०॥
टिप्पणियाँ
- २
प्रा० पा०—मोक्षात्मनः।