शिवजीने कहा—देवि! यह बड़े खेदकी बात है। देखो तो सही, समुद्रमन्थनसे निकले हुए कालकूट विषके कारण प्रजापर कितना बड़ा दुःख आ पड़ा है॥ ३७॥
अहो बत भवान्येतत् प्रजानां पश्य वैशसम्।
क्षीरोदमथनोद्भूतात् कालकूटादुपस्थितम्॥ ३७
शिवजीने कहा—देवि! यह बड़े खेदकी बात है। देखो तो सही, समुद्रमन्थनसे निकले हुए कालकूट विषके कारण प्रजापर कितना बड़ा दुःख आ पड़ा है॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.7.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 940) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/7/37/