इस प्रकार अपना-अपना स्थान निश्चित करके देवता और असुर अमृतप्राप्तिके लिये पूरी तैयारीसे समुद्रमन्थन करने लगे॥ ५॥✎ 696
कृतस्थानविभागास्त एवं कश्यपनन्दनाः।
ममन्थुः परमायत्ता अमृतार्थं पयोनिधिम्॥ ५
इस प्रकार अपना-अपना स्थान निश्चित करके देवता और असुर अमृतप्राप्तिके लिये पूरी तैयारीसे समुद्रमन्थन करने लगे॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.7.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 935) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/7/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)