श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.8.36

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

लिप्सन्तः सर्ववस्तूनि कलशं तरसाहरन्।

नीयमानेऽसुरैस्तस्मिन्कलशेऽमृतभाजने॥ ३६

lipsantaḥ sarvavastūni kalaśaṃ tarasāharan|

nīyamāne'suraistasminkalaśe'mṛtabhājane|| 36

अर्थ

वे ही आयुर्वेदके प्रवर्तक और यज्ञभोक्ता धन्वन्तरिके नामसे सुप्रसिद्ध हुए। जब दैत्योंकी दृष्टि उनपर तथा उनके हाथमें अमृतसे भरे हुए कलशपर पड़ी, तब उन्होंने शीघ्रतासे बलात् उस अमृतके कलशको छीन लिया। वे तो पहलेसे ही इस ताकमें थे कि किसी तरह समुद्रमन्थनसे निकली हुई सभी वस्तुएँ हमें मिल जायँ। जब असुर उस अमृतसे भरे कलशको छीन ले गये, तब देवताओंका मन विषादसे भर गया। अब वे भगवान्‌की शरणमें आये। उनकी दीन दशा देखकर भक्तवाञ्छाकल्पतरु भगवान्‌ने कहा—‘देवताओ! तुमलोग खेद मत करो। मैं अपनी मायासे उनमें आपसकी फूट डालकर अभी तुम्हारा काम बना देता हूँ’॥ ३५—३७॥✎ 713 714

यह अर्थ श्लोक 35–37 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #713 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #714 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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